गौरतलब है कि अडानी यहां पर जो कोयले से बिजली बना रहा है उसके लिए कोयला ऑस्ट्रेलिया से आएगा। यह कोयला लायजा के पास में जो समुद्र किनारा है वही पर उसकी प्राइवेट जेटी पर उतरेगा । वहां से कनवेयर बेल्ट से वह सीधा सीधा पावर जनरेशन कंपनी में पहुंचेगा।
यहाँ जो पावर बनेगा उसकी कच्छ को या गुजरात को कोई जरूरत नहीं है इसलिए यह पावर बाहर बेचा जाएगा और शायद इसका प्रथम ग्राहक पाकिस्तान होगा।
सोचने वाली बात यह है कि अडानी को पाकिस्तान के साथ बिजली का धंधा करवाने के लिए कच्छ की जमीन को दी गई है ।
जब यह फैक्ट्री चलेगी उसमें से कोयला जलेगा तो उसका धुंआ बहुत बड़ी चिमनी से बाहर जाएगा। पर्यावरण के विशेषज्ञ बोलते हैं कि इस धुए में राख भी होगी और बहुत छोटे कण भी होंगे। इससे आसपास के 30 किलोमीटर के विस्तार में इस धुए का असर पड़ेगा।
ये जो लाएजा गांव है वह अपनी खेती बाड़ी के लिए जाना जाता है। यह पूरा विस्तार कच्छ में ऐसा है कि यहां पर अच्छी खेती बाड़ी हो रही है। जब कोयले की राख नीचे बैठेगी तब वह 30 किलोमीटर तक के पेड़ पौधों पर चिपक जाएगी और इस वजह से पेड़ पौधे प्रकाश संश्लेषण नहीं कर पाएंगे और मर जाएंगे।
यह सब होने से आसपास के लोगो का जन जीवन बर्बाद हो सकता है । जब भी ऐसा बड़ा प्रोजेक्ट लगता है तो सरकार और कंपनी के लोग यह बोलते हैं कि इतना बड़ा प्रोजेक्ट है तो आसपास के लोगों को रोजगार मिलेगा लेकिन इस प्रोजेक्ट में ऐसा कुछ नहीं है जिससे आसपास के लोगों को ज्यादा रोजगार मिल सके । जहां पर कोयला उतरने वाला है वह समुद्र किनारे से कंपनी का अंतर सिर्फ 4 से 5 किलोमीटर है तो समुद्र से कोयला कंपनी तक लाने के लिए किसी प्रकार के वाहन की जरूरत नहीं है यह काम कनवेयर बेल्ट ही कर देगा! मतलब किसी को रोजगारी नहीं !
प्लांट चलाने के लिए जो लोग चाहिए वह ऑटोमेशन के जमाने में बहुत कम ही रह जाते हैं और ऐसे काम में आस-पास के गांव वाले कम ही सेवा दे सकते हैं इसके लिए इंजीनियर और एक्सपर्ट्स ज्यादा चाहिए
इसका मतलब यह हुआ कि पैसा अदानी का कंपनी उसकी कनवेयर बेल्ट उसका और आस-पास के गांव के लिए सिर्फ प्रदूषण!
धंधे का मुनाफा अडानी का
बिजली का फायदा पाकिस्तान का
आसपास के लोगों को मिला तो बस बेबसी का हाल !
इसके लिए यहां के लोगों ने विरोध किया है लेकिन इतनी बड़ी कंपनी के पास कुछ एक छोटे से गांव का क्या मॉल?
और इससे भी ताज्जुब की बात यह है कि यह पावर प्रोजेक्ट सिर्फ अकेला नहीं है इसके उपरांत इसी पावर प्रोजेक्ट के पास में एक गैस आधारित विद्युत मथक अभी बन रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यहां पर अगर गैस के साथ ठीक से काम नहीं हो सका तो कच्छ में दूसरा भोपाल बन सकता है और यहां पर भी जान माल का काफी नुकसान हो सकता है ।
यह जो फैक्ट्रियां काम करेगी उनसे जो कचरा निकलेगा वह सीधा कच्छ के समुद्र में फेंका जाएगा ।
आपको मालूम होगा कि यहां पर खास प्रकार के कछुए अंडे देने आते हैं जिसकी की उम्र 700 800 साल होती है। अगर ऐसी फैक्ट्रियां अपनी गंदगी और गर्मी समुद्र में छोड़ती है तो यहां की आबोहवा उन कछुओं के लिए जानलेवा हो सकती है।
कछुए की यह खास जाति विलुप्ति के कगार पर है और उसे आख़िरी धक्का शायद ऐसी कंपनिया लगा दे !
अब देखना यह है कि क्या भारत सरकार इन सभी पहलुओं पर फिर से विचार करेगी या लोगों को पर्यावरण को और कछुए जैसे आरक्षित प्राणी को अदानी के भरोसे छोड़ देगी?
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